काया नगर के बीच में लहरिया लम्बा पेड़ खजूर भजन लिरिक्स

।। दोहा ।।
कोयलड़ी काली गणी, मीठा थारा बेन।
किन विद थू काली पड़ी , किन विद राता नैन।

काया नगर रे बीच में रे ,
लहरिया लम्बा पेड़ खजूर ।
चढे तो मेवा चाखले रे ,
पड़े तो चकना चूर ।
भजन में खूब रमणा रे ,
लहरिया हरी सू राखो हेत ।
प्याला भर – भर पीवणा रे ,
लहरिया लागी हरि सूं डोर ॥

शबद कटारी बाकड़ी रे ,
लहरिया गुरु गमरी तलवार ।
अविनाशी री फौज मेंरे ,
कदे नहीं आणो हार ।
भजन में खूब रमणा रे ,
लहरिया हरी सू राखो हेत ।
प्याला भर – भर पीवणा रे ,
लहरिया लागी हरि सूं डोर ॥

माखी बैठी शहद पे रे ,
लहरिया पंखुड़ियाँ लिपटाय ।
उड़ने रा सांसा पड्या रे ,
लालच बुरी रे बलाय ॥
भजन में खूब रमणा रे ,
लहरिया हरी सू राखो हेत ।
प्याला भर – भर पीवणा रे ,
लहरिया लागी हरि सूं डोर ॥

जन्तर पड़िया जोजरा रे ,
लहरिया टूट गई सब तार ।
तार बिचारो काँहि करे ,
गयो रे बजावण हार ॥
भजन में खूब रमणा रे ,
लहरिया हरी सू राखो हेत
प्याला भर – भर पीवणा रे ,
लहरिया लागी हरि सूं डोर ॥

धमण धुखे गोळा तपे रे ,
लहरिया धड़ – धड़ पड़े रे जंजीर ।
रामानन्द री फौज में रे ,
सन्मुख लड़े रे कबीर ।
भजन में खूब रमणा रे ,
लहरिया हरी सू राखो हेत ।
प्याला भर – भर पीवणा रे ,
लहरिया लागी हरि सूं डोर ॥

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गायक :- अनिल नागौरी

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