बहना री तू चल सतसंग में भजन लिरिक्स

बहना री तू चल सतसंग में
समय मिल रही मुक्ती की, मुक्ती की।
वहा चर्चा होय सत भक्ती की।

(1) वह रही वहाँ ज्ञान की गंगा।
मिटे अज्ञान होय भव भंगा।
रस्ता अहंकार विरक्ती की-विरक्ती की।
वहा चर्चा होय सत भक्ती की।

(2) सतसंग से भव सिन्धु तरैगी।
नरक कुण्ड में नहीं परैगी।
सब व्याधि कटे आसक्ती की-आसक्ती की।
वहा चर्चा होय सत भक्ती की।

(3) कर विश्वास जरा तू मन में।
खुशियाँ भर जायें जीवन में।
बात सुनो अनुरक्ती की-अनुरक्त की।
वहा चर्चा होय सत भक्ती की।

(4) जीवन चार दिनों का मेला।
थोड़े दिन का जगत झमेला।
महावीर बात बतावै निवृक्ती की-निवृक्ती की।
वहा चर्चा होय सत भक्ती की।

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