बिना शीश की पनिहारी भजन लिरिक्स bina shish ki panihari Lyrics

।। दोहा ।।
नहीं मोती समंद खान का , नहीं सीप का चारा।
बिना पाल का समंद मायला ,साचा मोती सारा।।

भव बिन खेत खेत वन वाडी ,
ए जल बिन रेत जलबाई।
बिन डोरी जल भरे कुआ पर ,
बिना शीश की पनिहारी।

अरे सिर पर घडो घड़ा पर जारी,
देह पकड़ कर तू चाली। २
विनती करू उतार बेवड़ो ,
देखे धरयानी मुस्कानी । ओजी ।
भव बिन खेत। ……

अरे बिना रे जल के करे रसोई ,
सासु नंनद की ओ प्यारी। २
देकत फुक बजे सालुखी ,
चतुर नार की चतुराई। ओजी
भव बिन खेत। ……

अरे बिन धरनी एक बाग़ लगाया ,
बना जला एक भेल चढ़ी। २
बिना शीश का था एक मिरगा ,
पानी में रमता घडी घडी। ओजी ।
भव बिन खेत। ……

अरे धनिष बाण ले चढ़ीया शिकारी ,
नांदन वे पर बाग़ चढ़ी।
मिरगा को मार जमी पर डाला ,
ना मिरगा को चोट लगी। ओजी ।
भव बिन खेत। ……

अरे कहत कबीर बा सुन भाई साधु ,
ये पद है कोई निर्वाणी।
इणीं भजन की करे खोजना ,
वोही जन्त है सुरजाणीं। ओजी ।
भव बिन खेत। ……

भव बिन खेत खेत वन वाडी ,
ए जल बिन रेत जलबाई।
बिन डोरी जल भरे कुआ पर ,
बिना शीश की पनिहारी।

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