भरत भाई ! कपि से उ ऋण भजन लिरिक्स

भरत भाई !
कपि से उ ऋण हम नाहीं ॥

सौ योजन मर्यादा सिन्धु की ,
कूदि गयो क्षण माँहीं ।
लंका जारि सिया सुधि लायो ,
पर गर्व नहीं मन माँहीं ।
कपि से उ ऋण हम नाहीं ॥
भरत भाई । ……

शक्ति बाण लग्यो लक्ष्मण के ,
शोर भयो दल माँहीं ।
धोला गिर कर धर लायो ,
भौर ना होने पाई ॥
कपि से उ ऋण हम नाहीं ॥
भरत भाई । ……

अहि रावण की भुजा उखाड़ी ,
बैठि गयो मठ माँहीं ।
जो भैया हनुमंत नहीं होतो ,
तो करतो कौन सहाई ॥
कपि से उ ऋण हम नाहीं ॥
भरत भाई । ……

आज्ञा भंग कबहूं नहीं कीन्हीं ,
जहाँ पठायो तहाँ जाई ।
तुलसीदास पवनसुत महिमा ,
प्रभु निज मुख करत बड़ाई ॥
कपि से उ ऋण हम नाहीं ॥
भरत भाई । ……

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