मन का मैल मिटा न सको तो तन की सफाई मत करना भजन लिरिक्स

मन का मैल मिटा न सको तो तन की सफाई मत करना भजन लिरिक्स

दो. संत समाज बैठी यहाँ, और सज्जन लोग तमाम।
बड़े बुजर्ग माँ बहनों को, मेरा बारम्बार प्रणाम।।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, और कुशल संचालक जी।
मेरी भूल चूक करना क्षमा, मुझे जानके निज बालक जी।।

नहाये धोये तो क्या हुआ, रहयो मन मैं मैल समाय।
मीन सदा जल में रहे, जाकी तौऊ वास न जाय।।

मन का मैल मिटा न सको तो, तन की सफाई मत करना।
अपने दिल में झाँके बिना, गैरों की बुराई मत करना।।

(1) सतयुग में एक भक्त प्रहलाद ने, मन का मैल मिटाया था।
प्रगट भये पत्थर से भगवन, नर सिंह रूप दिखाया था।।
हिरणाकश्यप जैसी अपनी झूठी बड़ाई मत करना…

(2) त्रेता मैं श्री रामचन्द्र ने, मन में बात बिचारी थी।
पग रज लग पत्थर से प्रगटी गौतम ऋषि की नारी थी।।
बुरे कार्य मैं कभी किसी की, जरा सहाई मत करना…

(3) द्वापर में धृतराष्ट्र ने दिल के अन्दर देखा ना।
साड़ी खिंच रही द्रोपदी की, नृप को हुआ परेखा ना।।
बेटा कितना भी हो प्यारा, पर ऐसी भलाई मत करना…

(4) मन मैला तन उज्वल मेरा, बगुला कपटी अंग हुआ।
इससे तो कऊआ भला तन मन एक ही रंग हुआ।।
अरे परषोत्तम भजन बिना, तू जगत हंसाई मत करना…

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