माटी रो मटको घड़ियों रे कुमार भजन लिरिक्स

॥ दोहा ॥
जैसे चूड़ी काँच की , वैसी नर की देह ।
जतन करियां जावसी , हर भज लावो लेह ॥

माटी केडो मटको घड़ियो रे कुम्हार ,
घड़ियो रे कुम्हार ,
काया तो थारी काची रे घड़ी ॥
भूलो मति गेला रे गंवार ,
गेला रे गंवार ,
आयोडो अवसर चूको रे मति ।

नौ – नौ महिना रयो गरभ रे माँय ,
उंधे माथे झूले रे रयो ।
कौल वचन थू किया हरी सूं आप ,
बाहर आकर भूल रे गयो ।
माटी केडो मटको । …..

नख – शिख रा तो करिया रे बणाव ,
सूरत सोहेबे चोखी रे घड़ी ।
अनों – धनों रा भरिया रे भण्डार ,
ऊमर साहेबे ओछी रे लिखी ॥
माटी केडो मटको । …..

बांधी म्हारे सायबे दया धरम री पाळ ,
जिण में लागी इन्दर झड़ी ।
अरट बेवे वठे बारहों ही मास ,
इन्दर वाली एक ही झड़ी ।
माटी केडो मटको । …..

हरी रा बन्दा सायब ने चितार ,
आयो अवसर भूलो रे मती ।
बोल्या खाती बगसो जी घर नार ,
संगत साँची साधां री भली ॥
माटी केडो मटको । …..

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