सतगुरु सायब जी भजन लिरिक्स

।। दोहा ।।
सतगुरु मेरी आत्मा , में संतन की देह।
रोम रोम में रम गया , ज्यो बादल में मेघ।

सतगुरु सायब जी ओ ,
म्हारी वीनती सुण लो ।
वीणती सुणलो म्हारी ,
अरजी तोसुण लो ।
सतगुरु सायब जी ओ ,
म्हारी वीनती सुण लो ॥

म्हारे तो शत्रु घणा जी ,
भगती करण दे नाँय ।
काम क्रोध मद डाकण्यां ए ,
लागी म्हारे लार ॥
सतगुरु सायब। …..

तृष्णा है बल डाकिणी ,
आ लागी म्हारे लार ।
अजुहत ए धापी नहीं ,
खायो जुग संसार ।
सतगुरु सायब। …..

शब्द स्पर्श और रूप गन्ध जी ,
इणमें है वो पाँच ।
अपने अपने स्वाद को जी ,
जग में भूल्यो जाय ॥
सतगुरु सायब …..

मन मरकट माने नहीं ओ ,
कितना करूं रे उपाय ।
बहुत भाँत परमोदियो जी ,
म्हाने नचावे नाच ॥
सतगुरु सायब। …..

भवसागर का चक्कर में जी ,
आन पड़ी है नाव ।
करूणा सिन्धु कबीर सा ने ,
धरमी करे पुकार ॥
सतगुरु सायब। …..

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