घट घट में पंछी बोलता – कबीर

घट घट में पंछी बोलता ,
आप ही दंडी, आप तराज़ू ,
आप ही बैठा तोलता ,
आप ही माली, आप बगीचा ,
आप ही कलियाँ तोड़ता ,
सब बन में सब आप बिराजे ,
जड़ चेतना में डोलता ,
कहत कबीरा सुनो भाई साधो ,
मन की घूंडी खोलता

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