जब से मैं खाटू आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।

दोहा – मैंने कब कहा के,
मुझे दुनिया का माल दे,
लगी है ठेस दिल से निकाल दे,
मुझ गरीब का तो सांवरे,
इतना सवाल है,
जो कुछ समझ आये तुझे,
मेरी झोली में दाल दे।

जब से मैं खाटू आया,
तेरा प्यार मैंने पाया,
जो भी है मैंने चाहा,
जो भी है मैंने चाहा,
तेरे दर से श्याम पाया,
जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।।

लहरों में नाव बनकर,
धुप में छाव बनकर,
तूने दिया सहारा,
हर मोड़ पे है आकर,
लड़खड़ाया जब भी बाबा,
लड़खड़ाया जब भी बाबा,
तूने मुझे संभाला,
जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।।

गर्दिश के दिन थे बाबा,
ना कोई था सहारा,
ना कोई भी ख़ुशी थी,
ना कोई था हमारा,
अंधेरों में उजाला,
अंधेरों में उजाला,
मेरे श्याम ने दिखाया,
जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।।

जिसने तुझे पुकारा,
उसको ही तूने तारा,
तेरे दर से जो मिला है,
जाने सारा ज़माना,
‘जय कौशिक’ जहा में,
‘जय कौशिक’ जहा में,
देव यही निराला,
जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।।

जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया,
जो भी है मैंने चाहा,
जो भी है मैंने चाहा,
तेरे दर से श्याम पाया,
जब से मैं खाटु आया,
तेरा प्यार मैंने पाया।।

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