अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो लिरिक्स

।। दोहा ।।
दास द्वारका जा रहा, संग ले चावल पोट।
कृष्ण हमारा मित्र है, जरा न करियो खोट।

अरे द्वारपालों ! कन्हैया से कह दो ,
के दर पे सुदामा गरीब आ गया है।
भटकते भटकते ने जाने कहा से ,
तुम्हारे महल के करीब आ गया है।

न सर पे है पगड़ी, न तन पे है जामा ,
कन्हैया से कह दो नाम है सुदामा।
मित्र बचपन का है, विप्र निर्धनता है ,
चाहता है तुम्हारे दर्शन को आना।
एक बार मोहन, से जाकर ये कह दो ,
के दर पे सुदामा गरीब आ गया है। टेर।

सुनते ही दौड़े, चले आये मोहन ,
लगाके गले से, सुदामा को मोहन।
आँख भर आई, याद अब आई है ,
कहो कैसे हो कहा हो मित्र सुदामा।
हुआ रुकमणी को, बड़ा ही अचम्भा ,
ये मेहमान कैसा अजीब आ गया है। टेर।

सुदामा को अपने, बराबर बिठाते ,
श्याम आसुओ से चरण है धुलाते।
मित्र मिल जाते है, चैन अब पाते है ,
पोटली है बगल में, सुदामा छिपाते।
न घबरा जरा तू, मित्र सुदामा ,
ख़ुशी का समां तेरे करीब आ गया है। टेर।

पोटली बगल से, श्याम छीन लेते ,
क्या है पोटली में, बताओ ये कहते।
भेट चावल की है, ब्राह्मणी ने दी है ,
चाव से कन्हैया, मुट्ठी से खाते।
दो मुट्ठी चावल, कन्हैया ने खाए ,
मन रुकमणी का, घबरा गया है। टेर।

तीसरी जो मुट्ठी, कन्हैया ने भर ली ,
खाने से मना उनको, रुकमणी करती।
लोक दो देते है, कष्ट हर लेते है ,
प्रेम से है विदाई, मित्र की कर दी।
वैभव जहा से, दोनों जहा का ,
विप्र सुदामा अब पा गया है। टेर।

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